नागक्षेत्र तीर्थ के मां दुर्गा मंदिर में होती है श्रद्धालुओं की मन्नते पूरी

एस• के• मित्तल   
सफीदो,     ऐतिहासिक नगरी सफीदों का महाभारतकालीन नागक्षेत्र मां दुर्गा शक्तिपीठ असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। वैसे तो यहां पर हर रोज दर्शनार्थियों की भारी भीड़ रहती है लेकिन नवरात्रों के दिनों में यहां पर विशेष नजारा देखने को मिलता है। इन दिनों में यहां पर श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला लगातार जारी रहता है। गौरतलब है कि इस शक्तिपीठ में मां दुर्गा की प्रतीमा विराजमान है और श्रद्धालुओं की इस मंदिर के साथ अटूट आस्था जुड़ी हुई है।
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शक्तिपीठ का क्या है इतिहास
बताया जाता है कि जयंती देवी मंदिर जींद में स्थापना के लिए महाराजा जींद में मां दुर्गा की प्रतीमा ला रहे थे कि उस समय के सर्पदमन और आज के सफीदों आते-आते रात गहरा गई। उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को रात में रूकने के लिए किसी उचित स्थान तलाश करने के आदेश दिए। पता लगाकर कर्मचारियों ने नागक्षेत्र सरोवर पर रूकने का सुझाव दिया और राजा ने यहीं पर पड़ाव डालने के आदेश दिए। पड़ाव डालते वक्त मां दुर्गा की मूर्ति को भी यहीं पर उतार लिया गया। सुबह जब नित्यकर्म के पश्चात राजा ने चलने के लिए कहा और कर्मचारियों ने मूर्ति को उठाना चाहा तो मूर्ति वहां से टस से मस भ्भी नहीं हुई। सभी ने काफी प्रयास किए लेकिन सभी प्रयास शून्य रहे। जिस पर राजा सारा मामला समझ गए और उन्होंने पूरे भक्तिभाव से प्रण लिया कि वे इस प्रतीमा को नागक्षेत्र सरोवर प्रागंण में ही विराजित करवाएंगे। इस प्रण के बाद जब मूर्ति को उठाना चाहा तो मूर्ति हिल गई। राजा ने अपने प्रण के अनुसार मां दुर्गा की प्रतीमा को नागक्षेत्र सरोवर प्रांगण में मंदिर बनवाकर विराजमान करवाया। जिसके बाद राजा जयंती मंदिर जींद के लिए नई प्रतीमा लेकर आए।

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क्या इतिहास है नागक्षेत्र सरोवर का
कलियुग के आगमन के समय करीब 5 हजार वर्ष पहले महाभारतकालीन पांडव अर्जुन के परपोत्र एवं महाराज परीक्षित के पुत्र महाराजा जन्मेजय ने अपने पिता महाराज परीक्षित के तक्षक नाग द्वारा डंसने से हुई मृत्यु से दु:खी होकर यहां पर सर्पदमन नामक यज्ञ किया था। यहां पर स्थित सरोवर की तलहटी में सर्पदमन यज्ञ की वेदि बनाई गई। महाराजा जन्मेजय ने सर्पों के नाश करने के संकल्प के साथ विद्घानों के मार्गदर्शन में सर्पदमन नामक यज्ञ प्रारंम्भ किया तो यज्ञ के प्रभाव से सर्पों का नाश होने लगा। जन्मेजय के कृत्य से दु:खी होकर महर्षि बृहस्पति ने उन्हें यज्ञ बंद करने की सलाह दी। महर्षि ने कहा कि हर मनुष्य अपने प्रारब्ध कर्मों के परिणामस्वरूप ही सुख-दु:ख तथा जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है। महर्षि के कहने पर जन्मेजय ने सर्पदमन यज्ञ बन्द कर दिया। इसी यज्ञ के कारण इस तीर्थ को नागक्षेत्र के नाम से पुकारा जाता है।

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क्या कहते हैं पुजारी
इस मंदिर के पुजारी यतिंद्र कौशिक का कहना है कि इस मंदिर की महिमा दूर-दूर तक है। हर रोज सुबह शाम इस मंदिर में भ्भक्तों की चहल-पहल होती है। नवरात्रों में यहां एक प्रकार से मेले का माहौल होता है। इस मंदिर की दूर-दूर तक आस्था जुड़ी हुई है। यहां पर आकर अपनी मन्नतें मांगते हैं और उनकी मन्नतें भी पूरी होती है।

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