करनाल के फ्लाईओवर के नीचे शिक्षा का मंत्र: शिक्षक ने जरुरमंद बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाने का उठाया बीडा, पति, पत्नी व बच्चे अपने खर्च पर सीखा रहे क,ख,ग,घ

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सिद्धांतों के साथ समझौता न करके जीवन में कामयाबी हासिल करना ही प्रत्येक समाज के व्यक्ति की जिम्मेदारी है। अंधेरे जीवन में शिक्षा उजियारे का काम करती है और यह तभी संभव है जब सभी को घर-घर शिक्षा मिले। चार साल की अर्पिता की जुबान से शिक्षा का महत्व सुनकर ऐसा लगा जैसे सही में देश की तरक्की के लिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए पढ़ाई लिखाई जरूरी है। अर्पिता किसी महंगे स्कूल में नहीं बल्कि रेलवे फ्लाईओवर के नीचे खाली जमीन में मुफ्त में बंट रही शिक्षा हासिल करने वाली छात्रा है।

करनाल के फ्लाईओवर के नीचे शिक्षा का मंत्र: शिक्षक ने जरुरमंद बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर बनाने का उठाया बीडा, पति, पत्नी व बच्चे अपने खर्च पर सीखा रहे क,ख,ग,घ

पाठशाला में बच्चों को पढ़ाते शिक्षक।

पाठशाला में बच्चों को पढ़ाते शिक्षक।

दैनिक भास्कर के प्रतिनिधि ने जब मौके पर शिक्षा बांटने की तस्वीर देखी तो एक बार सिस्टम पर सवाल जरूर दिखाई दिए। यहां लगभग 130 गरीब झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चे शाम को कक्षा में पहुंचते हैं। खास है कि सभी बच्चे सप्ताह में एक भी दिन कक्षा का एक भी पीरियड मिस नहीं करते हैं। हम बात कर रहे हैं। एक सरकार शिक्षक द्वारा हांसी रोड स्थित रेलवे फ्लाईओवर नीचे चल रही उम्मीद पाठशाला की जहां सिस्टम के दावों से अंजान गरीब बच्चे अपने देश की तरक्की के लिए खुद को सक्षम बना रहे हैं।

शिक्षक जयकरण शस्त्री।

शिक्षक जयकरण शस्त्री।

एक शिक्षक ने सैकड़ों गरीब बच्चों को दिखाई शिक्षा की राह

जी हां आज आज शिक्षक दिवस है। एक व्यक्ति के जीवन में अगर माता-पिता के बाद जिस व्यक्ति का सबसे ज्यादा महत्व होता है वो शिक्षक का होता है क्योंकि, शिक्षक ही अपने विद्यार्थी के ज्ञान का एकमात्र सहारा होता है। आज भी समाज में ऐसे शिक्षक हैं जिनकी कर्मठता, सदाचार और राष्ट्र निर्माण के प्रति उनके कार्यों से शिक्षक समाज का मस्तक गर्व से ऊंचा हुआ है। उन्हें इस काम के लिए किसी शिक्षक दिवस की जरूरत नहीं है। हर दिन उनके लिए शिक्षक दिवस है। आइए रुबरू होते हैं करनाल के रहने वाले शिक्षक जय करण शास्त्री से जो जाणी गांव के राजकीय स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के बाद हर रोज शाम को दो घंटे अपने परिवार के साथ हांसी रोड़ पर रेलवे फ्लाईओवर के नीचे उम्मीद की पाठशाला चला रहे है। यहां पर जरूरतमंद बच्चों को पढ़ा रहे है। उनकी एक छोटी सी पहल ने सैकड़ों गरीब बच्चों में शिक्षा की राह दिखाई है। ताकि ये बच्चे भी पढ़ लिख कर समाज की मुख्य धारा से जुड़ सकें। ऐसे में खुले में लग रही इस पाठशाला से सिस्टम पर सवाल उठते है कि आखिर क्यों इन बच्चों को आज तक पढ़ाई के लिए छत क्यों नहीं मिली।

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बच्चों को शिक्षा देते अध्यापक।

बच्चों को शिक्षा देते अध्यापक।

दो बच्चों से की थी उम्मीद पाठशाला की शुरूआत

कारोना काल के दौरान जब स्कूल बंद थे लोगों के रोजगार चले गए थे, कुछ अभिभावकों ने अपने बच्चों को स्कूलों से पढ़ना हटा लिया था। उस समय शिक्षक जयकरण शास्त्री ने अपने पत्नी के साथ इस उम्मीद की पाठशाला की शुरूआत 3 जुलाई 2021 में की थी। पहले दिन 2 बच्चों से इस पाठशाला की शुरुआत की थी। उसके बाद दोनों ने आसपास के एरिया में जाकर ऐसे बच्चों की तलाशा की जो स्कूल में न जाते हो उनके अभिभावकों से मिलकर उन बच्चों को उम्मीद की पाठशाला से जोडा। वहीं इन बच्चों की शिक्षा देने के लिए सरकार व प्रशासन से एक जगह की मांग थी ताकि वह अपनी पाठशाला को किसी छत के नीचे चला सके और जरूरतमंदों को निशुल्क शिक्षा देकर उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ सके। लेकिन जब कहीं पर जगह नहीं मिली तो रेलवे फ्लाईओवर के नीचे ही उम्मीद की पाठशाला शुरू कर दी। आज इस पाठशाला में 5 शिक्षक और इन जरूरतमंद बच्चों को फ्री शिक्षा दे रहे है। आज इस उम्मीद की पाठशाला में 130 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे है।

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फ्लाईओवर के पिल्लर पर बच्चों को पढ़ाते अध्यापक।

फ्लाईओवर के पिल्लर पर बच्चों को पढ़ाते अध्यापक।

फ्लाईओवर के पिल्लरों को ही बना दिया ब्लैकबोर्ड

प्रशासन व सरकार द्वारा जब बच्चों के लिए कोई जगह नहीं दी गई तो शिक्षकों ने पाठशाला में बढ़ती बच्चों की संख्या को देखते हुए उन्हें क,ख,ग,ख सिखाने के लिए फ्लाईओवर के पिल्लरों को ब्लैकबोर्ड बना दिया और उसी पर बच्चों की पढ़ाना शुरू कर दिया।

बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रशासन से लगाई जगह की गुहार

शिक्षक जयकरण शस्त्री ने कहा कि इस पाठशाला में अब लगातार जरूरतमंद बच्चों की संख्या बढ़ रही है। जिससे अब फ्लाईओवर के नीचे बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो रहा है। वहीं खुले में पढ़ाई करते समय ट्रेन व वाहनों की आवाज से बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। अब वह प्रशासन व सरकार से मांग कर रहे है उन्हें कहीं आसपास कोई ऐसी जगह दी जाए जहां पर इन बच्चों की पढ़ाई हो सके। उन्होंने कहा कि एक शिक्षक का कर्तव्य है कि वह हर बच्चे को शिक्षा देकर समाज की मुख्य धारा से जोड़े। ​​​​​​

जानकारी देती पत्नी सुषमा।

जानकारी देती पत्नी सुषमा।

कोरोना काल में बच्चों को घर बैठा देख लिया था फैसला

शिक्षक की पत्नी सुष्मा ने कहा कि जब कोरोना का समय तब सभी बच्चे घरो पर बैठे हुए थे, उसके बाद जब कोरोना से राहत मिली तो कुछ गरीब बच्चों के स्कूल छुट गए थे उन्हीं बच्चों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए उम्मीद की पाठशाला शुरू की गई थी। आज इस पाठशाला में 130 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे है और 5 शिक्षक इन बच्चों को निशुल्क शिक्षा दे रहे है।

जानकारी देती महक।

जानकारी देती महक।

बेटी भी दे रही बच्चों को शिक्षा

माता पिता की इस उम्मीद की पाठशाला को देखकर स्कूल में पढ़ने वाली इनकी बेटी महक भी हर रोज अपने माता के साथ इस रेलवे फ्लाईओवर के नीचे बच्चों की पढ़ा रही है। महक का कहना है कि मै जानती हूं आज के समय में शिक्षा की क्या कीमत है अगर आज के समय में कोई भी बच्चा शिक्षा से वंछित रह जाता है वह समाज की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाता। यहां पर पढ़ने वाले हर बच्चे का सपना है कि वह बड़ी होकर डॉक्टर इंजीनियर बनने का सपना है। हमारी इस पहल से अगर किसी का सपना साकार हो जाए तो उसे बहुत खुशी होगी।

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छात्रा कोमल।

छात्रा कोमल।

7 साल की बेटी दे रही प्राइवेट स्कूल के बच्चों को मात

फ्लाईओवर के नीचे शिक्षा प्राप्त कर रही 7 साल की कोमल को देखकर आप भी दंग रह जागऐं। यह बच्ची अपने से 10 साल बड़े बच्चों को सभी सब्जेक्ट मे मात दे सकती है। कोमल 31 तक के पहाड़े बिना रूके सुना देती है। एक बार तो इस बच्ची की नॉलज देकर अध्यापक भी दंग रह जाते है। कोमल बड़े होकर कल्पना चावला जैसी बनना चाहती है। ताकि वह भी अपने माता पिता का नाम रोशन कर सके। इस पाठशाला में कोमल की तरह बहुत से सारे ऐसे विद्यार्थी है जो प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मात दे सकते है।

 

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