भास्कर खास, हेल्थ वर्करों को अम्मा ने दी सीख,बोलीं:: डॉक्टरों व नर्सों के चेहरे पर हमेशा मुस्कान, सुखद वचन, दृष्टि में विनय, नम्रता और अच्छे श्रोता के गुण होने चाहिए

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कहा, रोगी डॉक्टर के पास वैसे ही आते हैं जैसे भक्त भगवान के पास थोड़ी करुणा और राहत की विनती लेकर आता है।

फरीदाबाद के सेक्टर 88 में करीब 133 एकड़ में बनाए जा रहे 2600 बेड के पूरे एशिया में सबसे बड़े मल्टी स्पेशयालिटी अस्पताल के उद्घाटन मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में अमृता अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर की फाउंडर मां अमृतानंदमयी देवी ने देश के स्वास्थ्यकर्मियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए उन्हें मरीजों के साथ किए जाने वाले व्यवहारों की सीख दी।

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अम्मा ने कहा कि अस्पताल में कार्यरत सभी लोगों जैसे, डॉक्टरों, नर्सों व अन्य कर्मचारियों के होठों पर हमेशा मुस्कान होनी चाहिए। उनके वचन सुखद हों। उनकी दृष्टि में विनय और नम्रता हो, उन्हें अच्छा श्राेता होना चाहिए। रोगियाें की मन:स्थिति को समझते हुए उनकी सेवाओं में सक्षम होना चाहिए। यह तभी संभव है जब हमारे अंदर आम जनमानस की सेवा भावना के विचार हो।

मनुष्य और ईश्वर के बीच सेतु होते हैं डाॅक्टर

मलयालम भाषा में देश विदेश व आसपास के गांवों से आए हुए लोगों को संबोधित करते हुए अम्मा ने कहा कि डॉक्टर, मनुष्य और ईश्वर के बीच सेतु होते हैं। अत: अच्छे डॉक्टर को अदभुत शक्ति रखनी चाहिए। ठीक उसी प्रकार से जैसे, वह आधुनिक चिकित्सा एवं आविष्कारों में रखते हैं। उन्होंने कहा कि रोगी डॉक्टरों के पास वैसे ही आते हैं, जैसे भक्त भगवान के पास थोड़ी करूणा और राहत की विनती लिए। रोग एक निराशा जनक स्थिति है। उसके लिए अस्पताल ही आश्रय स्थल होता है। जहां तक रोगी का संंबंध है, डाॅक्टर प्रत्यक्ष रूप से भगवान होता है। क्योंकि दर्द में राहत वही देता है।

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बचपन की घटना बता दिया मानवता का संदेश

अम्मा ने करीब 58 साल पुरानी अपने बचपन की एक घटना बताई। उन्होंने कहा कि जब वह दस वर्ष की थी तो उनका पांच साल का एक छोटा भाई बीमार हो गया। अम्मा उसे एक किलोमीटर दूर छोटे से दवाखाना में लेकर गई। दवाखाने में रोगियाें के भर्ती करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। बस एक डाॅक्टर व दो तीन नर्स हुआ करती थी। दवाखाने के बरामदे में एक महिला लोट-लोट कर जोर-जोर से चिल्ला रही थी। अम्मा ने वहां माैजूद लोगों से कारण पूछा तो पता चला कि उसकी किडनी में पथरी है। इसलिए असहनीय पीड़ा हो रही है। मूत्र का निकासन नहीं हो रहा था। उस समय डॉक्टर इंजेक्शन लगाने के लिए एक ही सीरिंज का प्रयोग करते थे। बाद में उसे गर्म पानी में उबालकर दूसरे के लिए प्रयोग करते थे। कई बार बिजली नहीं हाेती थी तो हीटर में वह काम भी नहीं हो पाता था। उस समय रोगी दस पैसे में एल्कोहल की छोटी बोतल लाकर नर्स को देता था ताकि वह सीरिंज को उबालकर उसे लगा सके। वह महिला इस लिए तड़प रही थी कि उसके पास दस पैसे भी नहीं थे कि वह एल्कोहल ला सके।

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भाई के इलाज के पैसे महिला को दे दिया

अम्मा ने बताया कि उनकी जन्मदात्री मां ने भाई के इलाज के दौरान खाने पीने के लिए 15 पैसे दिए थे। अम्मा ने महिला की पीड़ा देखकर चुपचाप उसमें से दस पैसे निकालकर महिला को दे दिए। शेष बचे पांच पैसे में भाई के लिए डोसा ले लिया और चाय की जगह पानी पिलाकर काम चलाया। अम्मा के कानों में आज तक उस गरीब महिला का दर्ज गूंजता है। इस घटना को बताने का मकसद यही था कि हर व्यक्ति के अंदर सेवा की भावना होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सेवा का कोई भी अवसर हाथ से जाने न दो। जिनके ह्दय में नि:स्वार्थ सेवा का भाव होता है, संपूर्ण जगत उसे आदर की दृष्टि से देखता है। इसलिए मानव जीवन में हमें धरती माता पर घाव के निशान नहीं बल्कि उनके केशों को फूलों से सजाकर जाना चाहिए।

सभी से समानता के प्रेम का दिया संदेश

अम्मा ने कहा कि सनातन धर्म के अनुसार सृष्टा और सृष्टि में कोई भेद नहीं तो हमें समूची सृष्टि में ईश्वरत्व का दर्शन करते हुए सभी से समानता के साथ प्रेम करना चाहिए। हम दूसरों के बदलने की राह देखते रहेंगे तो कुछ नहीं होगा। इसलिए पहले स्वयं को बदलने की कोशिश करें। फिर हमें देखकर दूसरे भी हमारा अनुशरण करेंगे।

 

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