भगवान की लीलाएं, जन्म और कर्म दिव्य होते हैं: आचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज

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श्रद्धालुओं को वामन अवतार की कथा सुनाकर किया निहाल

एस• के• मित्तल
सफीदों,     नगर के ऐतिहासिक महाभारतकालीन नागक्षेत्र सरोवर हाल में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में व्यास पीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए भागवत पीठाधीश्वर आचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज ने कहा कि भगवान की लीलाएं, जन्म और कर्म दिव्य होते हैं। भगवान की अनंत लीलाएं हैं भारतीय संस्कृति की चेतना को रसमय बनाती हैं। वामन अवतार की लीलाएं उनमें से एक है। इस मौके पर समाजसेवी तीर्थराज गर्ग ने महाराज श्री का माल्यार्पण करके अभिनंदन किया। आचार्य देशमुख वशिष्ठ ने कहा कि श्रीमद्भगवद पुराण में वामन अवतार का भाव-भरित और भक्तजनरंजक विस्तार है। वामन भगवान ब्राह्ममण-ब्रह्मचारी बटुक का रूप धारण करते हैं। वामन बटुक यज्ञोपवीत, मृगचर्म, पलाश दण्ड, कुश का बना वस्त्र, छत्र, खड़ाऊं, जनेऊ, कमण्डलु, कोपीन, रुद्राक्ष माला तथा भिक्षा पात्र धारण करके सौन्दर्य और तेज से सुशोभित होकर राजा बलि के यज्ञ की ओर आए। राजा बलि ने भगवान को प्रसन्न करने हेतु अपना सबकुछ अर्पित करने की अभिलाषा प्रकट की। भगवान ने भी बलि के वंश की प्रशंसा करते हुए प्रह्लाद जैसे भक्त तथा बलि के पिता विरोचन को ब्राह्मïण वत्सल बताते हुए उसे भी उस परम्परा का पालन करने को कहा। भगवान वामन ने बलि को वचन निभाने के लिए दृढ़ कर लिया। तत्पश्चात भगवान ने बलि से अपने लिए अपने पैरों के माप की तीन पग भूमि मांगी। बलि ने संकल्प के लिए जल उठाया तो उसके गुरु शुक्राचार्य ने उसे ऐसा करने से रोका और स्पष्ट रूप से बता दिया कि ये स्वयं भगवान विष्णु हैं तथा देवताओं का हित साधने आए हैं। किन्तु बलि अपने वचन पर अडिग रहा। जैसे ही बलि ने दान का संकल्प किया वैसे ही भगवान का आकार बढऩे लगा और सभी ने उनके विराट रूप का दर्शन किया। भगवान ने एक पग से समस्त पृथ्वी, आकाश व दिशाओं को ढक लिया। दूसरे पग में सारा स्वर्गलोक आ गया तथा तीसरे पग के लिए रंचमात्र भी स्थान न बचा। भगवान की इच्छा से गरुड़ ने बलि को वरुण पाश में बांध लिया। उन्होंने बलि से कहा वचन पूरा न होने से तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा। बलि ने कहा, आप तीसरा पग मेरे सिर पर रखें। बलि तो केवल भगवान के प्रति प्रेम-निष्ठा बनाए रखने का इच्छुक था। बली द्वारा संकल्प निभाने से खुश भगवान ने कहा, बलि पर मेरी कृपा है, मैं इन्हें वह स्थान देता हूं जो देवताओं को भी सुलभ नहीं है। ये सावर्णि मनुकाल में स्वर्ग के राजा बनेंगे। तब तक ये सुतल लोक में रहेंगे और मैं सभी प्रकार से इन्हें संरक्षण प्रदान करूंगा। बलि की प्रार्थना पर सदैव दर्शन देने का वरदान भी दे दिया नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिम वस्थितम्।
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भगवान का कथन है, मैं जिसके ऊपर कृपा करता हूं, उसके धन का हरण कर लेता हूं, जिस धन के मद से व्यक्ति उन्मत्त होकर लोक की और मेरी अवमानना करता है। उत्तम पात्र, पवित्र देश व पुण्य काल में दिया हुआ दान विशेष सुखदायक होता है। भगवान की वामन लीला भक्तों के हृदय को अपनी सर्वव्यापी कृपा की रसनीय धारा में सराबोर कर देने वाली है। वामन चरित्र का रहस्य यह है कि यद्यपि परमात्मा बड़े हैं, तब भी बलि के आगे वामन अर्थात छोटे बनते हैं। इस मौके पर तीर्थराज गर्ग, पुरुषोत्तम शर्मा, रोहतास भारद्वाज, एडवोकेट बृजेश्वर अग्रवाल, वेदप्रकाश नंदवानी, यशपाल देशवाल, विजय दीवान, यशपाल सूरी, नंदलाल गांधी, दर्शनलाल मेहता, चेतनदास भाटिया, मा. रघुवीर सिंह, मा. सुरेंद्र शर्मा, रामचंद्र मिस्त्री, सोहन लाल धीमान व मा. हंसराज मौजूद थे।
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